
अजीत मिश्रा (खोजी)
सावधान! नेटवर्क मार्केटिंग के जाल में फंसा 100 करोड़ का महा-फर्जीवाड़ा: बेरोजगारों के सपनों का सौदा
- 60 हजार बेरोजगार बने शिकार: उत्तर प्रदेश समेत देश के कई राज्यों के युवाओं से नौकरी और मोटी कमाई का झांसा देकर की गई करोड़ों की वसूली।
- 100 से अधिक गुप्त ट्रेनिंग सेंटर बेनकाब: युवाओं को जाल में फंसाने के लिए विभिन्न राज्यों में चलाए जा रहे थे अवैध प्रशिक्षण केंद्र।
- आयुर्वेदिक किट के नाम पर लूट: जॉइनिंग के एवज में 15,000 से 30,000 रुपये ऐंठकर थमाई जाती थी घटिया सामग्री।
कानपुर। बेरोजगार युवाओं को घर बैठे 20-25 हजार कमाने का झांसा देकर 100 करोड़ की लूट करने वाले अंतरराज्यीय गिरोह पर कानपुर पुलिस ने बड़ा प्रहार किया है। हनुमंत विहार थाना, क्राइम ब्रांच और साइबर सेल की संयुक्त टीम ने ‘विन मेकर’ और ‘धनवंतरी आयुर्वेदा’ के नाम पर पिरामिड चेन चलाने वाले 6 जालसाजों को धर दबोचा है।
बेरोजगारी के इस दौर में सरकारी नौकरियों के लाले पड़े हैं और प्राइवेट सेक्टर में संघर्ष की कोई सीमा नहीं। इसी लाचारी और मजबूरी को जब कुछ शातिर दिमाग लोग अपना ‘धंधा’ बना लें, तो अंजाम क्या होता है—इसकी एक खौफनाक बानगी कानपुर में देखने को मिली है। कानपुर पुलिस, क्राइम ब्रांच और साइबर सेल की संयुक्त कार्रवाई ने उस अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश किया है, जिसने ‘विन मेकर’ और ‘धनवंतरी आयुर्वेदा’ जैसे मुखौटों के पीछे छिपकर करीब 60 हजार बेरोजगार युवाओं की गाढ़ी कमाई से 100 करोड़ रुपये का चूना लगाया।
यह सिर्फ एक आर्थिक अपराध नहीं है, बल्कि यह उन लाखों युवाओं के सपनों और उम्मीदों पर सीधा वार है जो ईमानदारी से अपने पैरों पर खड़ा होना चाहते थे।
ठगी का शातिर मॉडल: झांसा, वसूली और फर्जीवाड़ा
इस गिरोह का काम करने का तरीका बेहद सुनियोजित और खतरनाक था:
- प्रलोभन का जाल: बेरोजगार युवाओं को टारगेट कर घर बैठे हर महीने 20 से 25 हजार रुपये कमाने का लालच दिया जाता था।
- अवैध वसूली: ‘जॉइनिंग’ के नाम पर प्रति व्यक्ति 15,000 से 30,000 रुपये तक वसूले जाते थे।
- धोखे का टूल: पैसों के बदले युवाओं के हाथ में मामूली सी ‘आयुर्वेद किट’ थमा दी जाती थी और असली धंधा—यानी एक पिरामिड चेन सिस्टम (Ponzi Scheme)—शुरू करवा दिया जाता था।
- गुप्त ट्रेनिंग सेंटर: उत्तर प्रदेश समेत देश के कई राज्यों में 100 से अधिक गुप्त ट्रेनिंग सेंटर चलाए जा रहे थे, जहां युवाओं को दूसरों को फंसाने की ‘गुरिल्ला मार्केटिंग’ सिखाई जाती थी।
खोखले वादे और सिस्टम की नाकामी
सवाल यह उठता है कि क्या इन फर्जी कंपनियों की भनक प्रशासनिक तंत्र को तब तक नहीं लगती जब तक 100 करोड़ का घोटाला हो जाए? देश के अलग-अलग कोनों में 100 से अधिक गुप्त ट्रेनिंग सेंटर हवा में नहीं चल रहे थे। इन ठगों को यह विश्वास कहां से मिलता है कि वे खुलेआम युवाओं का शोषण कर सकते हैं?
यह मामला सिर्फ 6 आरोपियों की गिरफ्तारी पर खत्म नहीं होना चाहिए। इस सिंडिकेट की जड़ें देश में कितनी गहरी हैं, इसकी गहराई से पड़ताल जरूरी है। जिन कंपनियों के नाम पर यह खेल खेला गया—चाहे वे मुखौटा कंपनियां हों या मोहरे—उनकी जवाबदेही तय होनी ही चाहिए।
युवाओं के लिए सबक और प्रशासन के लिए चेतावनी
यह घटना देश के उन तमाम युवाओं के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो शॉर्टकट से अमीर बनने के ख्वाब देखते हैं। कोई भी वैध व्यवसाय आपको रातों-रात बिना किसी स्किल के हजारों रुपये कमाने का झांसा नहीं देता। ‘नेटवर्क मार्केटिंग’ या ‘डायरेक्ट सेलिंग’ के नाम पर चलने वाले कई पिरामिड सिस्टम असल में चंदे के बिजनेस हैं, जहां नीचे वाले का शोषण करके ऊपर वाले की तिजोरी भरी जाती है।
कानपुर पुलिस और साइबर सेल की यह कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन न्याय तभी पूरा होगा जब लूटे गए एक-एक पाई की रिकवरी हो और इस सिंडिकेट के हर एक मास्टरमाइंड को ऐसा सबक मिले कि भविष्य में कोई दूसरा गिरोह बेरोजगारों की लाचारी का सौदा करने की हिम्मत न जुटा सके।
पुलिस का कहना है – यह सिर्फ कंपनी नहीं, बेरोजगारी के नाम पर युवाओं के सपनों को बेचने वाला संगठित अपराध है।




